Wednesday, October 30, 2013

फलादेश के सामान्य नियम

फलादेश के सामान्य नियम
यह जानना बहुत जरूरी है कि कोई ग्रह जातक को क्या फल देगा। कोई ग्रह कैसा फल देगा, वह उसकी कुण्डली में स्थिति, युति एवं दृष्टि आदि पर निर्भर करता है। जो ग्रह जितना ज्यादा शुभ होगा, अपने कारकत्व को और जिस भाव में वह स्थित है, उसके कारकत्वों को उतना ही अधिक दे पाएगा। नीचे कुछ सामान्य नियम दिए जा रहे हैं, जिससे पता चलेगा कि कोई ग्रह शुभ है या अशुभ। शुभता ग्रह के बल में वृद्धि करेगी और अशुभता ग्रह के बल में कमी करेगी।
नियम 1 - जो ग्रह अपनी उच्च, अपनी या अपने मित्र ग्रह की राशि में हो - शुभ फलदायक होगा। इसके विपरीत नीच राशि में या अपने शत्रु की राशि में ग्रह अशुभफल दायक होगा।
नियम 2 - जो ग्रह अपनी राशि पर दृष्टि डालता है, वह शुभ फल देता है।
नियम 3 - जो ग्रह अपने मित्र ग्रहों के साथ या मध्य हो वह शुभ फलदायक होता है। मित्रों के मध्य होने को मलतब यह है कि उस राशि से, जहां वह ग्रह स्थित है, अगली और पिछली राशि में मित्र ग्रह स्थित हैं।
नियम 4 - जो ग्रह अपनी नीच राशि से उच्च राशि की ओर भ्रमण करे और वक्री न हो तो शुभ फल देगा।
नियम 5 - जो ग्रह लग्नेहश का मित्र हो।
नियम 6 - त्रिकोण के स्वा‍मी सदा शुभ फल देते हैं।
नियम 7 - केन्द्र का स्वामी शुभ ग्रह अपनी शुभता छोड़ देता है और अशुभ ग्रह अपनी अशुभता छोड़ देता है।
नियम 8 - क्रूर भावों (3, 6, 11) के स्वामी सदा अशुभ फल देते हैं।
नियम 9 - उपाच्य भावों (1, 3, 6, 10, 11) में ग्रह के कारकत्वत में वृद्धि होती है।
नियम 10 - दुष्ट स्थानों (6, 8, 12) में ग्रह अशुभ फल देते हैं।
नियम 11 - शुभ ग्रह केन्द्र (1, 4, 7, 10) में शुभफल देते हैं, पाप ग्रह केन्द्र में अशुभ फल देते हैं।
नियम 12 - पूर्णिमा के पास का चन्द्र शुभफलदायक और अमावस्या के पास का चंद्र अशुभफलदायक होता है।

नियम 13 - बुध, राहु और केतु जिस ग्रह के साथ होते हैं, वैसा ही फल देते हैं।

नियम 14 - सूर्य के निकट ग्रह अस्त हो जाते हैं और अशुभ फल देते हैं।
इन सभी नियम के परिणाम को मिलाकर हम जान सकते हैं कि कोई ग्रह अपना और स्थित भाव का फल दे पाएगा कि नहींय़ जैसा कि उपर बताया गया शुभ ग्रह अपने कारकत्व को देने में सक्षम होता है परन्तु अशुभ ग्रह अपने कारकत्व को नहीं दे पाता।


सफलता और समृद्धि के योग

किसी कुण्‍डली में क्‍या संभावनाएं हैं, यह ज्‍योतिष में योगों से देखा जाता है। भारतीय ज्‍योतिष में हजारों योगों का वर्णन है जो कि ग्रह, राशि और भावों इत्‍यादि के मिलने से बनते हैं। हम उन सारे योगों का वर्णन न करके, सिर्फ कुछ महत्‍वपूर्ण तथ्‍यों का वर्णन करेंगे जिससे हमें पता चलेगा कि जातक कितना सफल और समृद्ध होगा। सफतला, समृद्धि और खुशहाली को मैं 'संभावना' कहूंगा।

किसी कुण्‍डली की संभावना निम्‍न तथ्‍यों से पता लगाई जा सकती है
1- लग्‍न की शक्ति
2- चन्‍द्र की शक्ति
3- सूर्य की शक्ति
4- दशम भाव की शक्ति
5- योग

लग्‍न, सूर्य, चंद्र और दशम भाव की शक्ति पहले दिए हुए 14 नियमों के आधार पर निर्धारित की जा सकती है। योग इस प्रकार हैं -

योगकारक ग्रह
सूर्य और चंन्‍द्र को छोडकर हर ग्रह दो राशियों का स्‍वामी होता हैं। अगर किसी कुण्‍डली में कोई ग्रह एक साथ केन्‍द्र और त्रिकोण का स्‍वामी हो जाए तो उसे योगकारक ग्रह कहते हैं। योगकारक ग्रह उत्‍तम फल देते हैं और कुण्‍डली की संभावना को भी बढाते हैं।

उदाहरण कुम्‍भ लग्‍न की कुण्‍डली में शुक्र चतुर्थ भाव और नवम भाव का स्‍वामी है। चतुर्थ केन्‍द्र स्‍थान होता है और नवम त्रिकोण स्‍थान होता है अत: शुक्र उदाहरण कुण्‍डली में एक साथ केन्‍द्र और त्रिकोण का स्‍वामी होने से योगकारक हो गया है। अत: उदाहरण कुण्‍डली में शुक्र सामान्‍यत: शुभ फल देगा यदि उसपर कोई नकारात्‍मक प्रभाव नहीं है।

राजयोग
अगर कोई केन्‍द्र का स्‍वामी किसी त्रिकोण के स्‍वामी से सम्‍बन्‍ध बनाता है तो उसे राजयोग कहते हैं। राजयोग शब्‍द का प्रयोग ज्‍योतिष में कई अन्‍य योगों के लिए भी किया जाता हैं अत: केन्‍्द्र-त्रिकोण स्‍वा‍मियों के सम्‍बन्‍ध को पारा‍शरीय राजयोग भी कह दिया जाता है। दो ग्रहों के बीच राजयोग के लिए निम्‍न सम्‍बन्‍ध देखे जाते हैं -
1 युति
2 दृष्टि
3 परिवर्तन

युति और दृष्टि के बारे में हम पहले ही बात कर चुके हैं। परिवर्तन का मतलब राशि परिवर्तन से है। उदाहरण के तौर पर सूर्य अगर च्ंद्र की राशि कर्क में हो और चन्‍द्र सूर्य की राशि सिंह में हो तो इसे सूर्य और चन्‍द्र के बीच परिवर्तन सम्‍बन्‍ध कहा जाएगा।

धनयोग
एक, दो, पांच, नौ और ग्‍यारह धन प्रदायक भाव हैं। अगर इनके स्‍वामियों में युति, दृष्टि या परिवर्तन सम्‍बन्‍ध बनता है तो इस सम्‍बन्‍ध को धनयोगा कहा जाता है।

दरिद्र योग
अगर किसी भी भाव का युति, दृष्टि या परिवर्तन सम्‍बन्‍ध तीन, छ:, आठ, बारह भाव से हो जाता है तो उस भाव के कारकत्‍व नष्‍ट हो जाते हैं। अगर तीन, छ:, आठ, बारह का यह सम्‍बन्‍ध धन प्रदायक भाव (एक, दो, पांच, नौ और ग्‍यारह) से हो जाता है तो यह दरिद्र योग कहलाता है।

जिस कुण्‍डली में जितने ज्‍यादा राजयोग और धनयोग होंगे और जितने कम दरिद्र योग होंगे वह जातक उतना ही समृद्ध होगा।

Sunday, October 27, 2013

कुण्डली का पांचवा घर संतान भाव के रूप में

कुण्डली का पांचवा घर संतान भाव के रूप में विशेष रूप से जाना जाता है (The fifth house of the Lal Kitab stands for progeny). ज्योतिषशास्त्री इसी भाव से संतान कैसी होगी, एवं माता पिता से उनका किस प्रकार का सम्बन्ध होगा इसका आंकलन करते हैं.

इस भाव में स्थित ग्रहों को देखकर व्यक्ति स्वयं भी काफी कुछ जान सकता है जैसे:

पांचवें घर में सूर्य (Sun in Fifth House)
लाल किताब के नियमानुसार पांचवें घर में सूर्य का नेक प्रभाव होने से संतान जब गर्भ में आती है तभी से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होना शुरू हो जाता है. इनकी संतान जन्म से ही भाग्यवान होती है. यह अपने बच्चों पर जितना खर्च करते हैं उन्हें उतना ही शुभ परिणाम प्राप्त होता है. इस भाव में सूर्य अगर मदा (Weak sun in Lal kitab gives unhappiness from children) होता है तो माता पिता को बच्चों से सुख नहीं मिल पाता है. वैचारिक मतभेद के कारण बच्चे माता पिता के साथ नहीं रह पाते हैं.

पांचवें घर में चन्द्रमा (Moon in fifth house)
चन्द्रमा पंचवें घर में संतान का पूर्ण सुख देता है. संतान की शिक्षा अच्छी होती है. व्यक्ति अपने बच्चों के भविष्य के प्रति जागरूक होता है. व्यक्ति जितना उदार और जनसेवी होता है बच्चों का भविष्य उतना ही उत्तम होता है. इस भाव का चन्द्रमा अगर मंदा हो तो संतान के विषय मे मंदा फल देता है (Weak Moon in fifth house causes problems from children). लाल किताब का उपाय है कि बरसात का जल बोतल में भरकर घर में रखने से चन्द्र संतान के विषय में अशुभ फल नहीं देता है.

पांचवें घर में मंगल (Mars in the fifth house of Lal kitab kundali)
लाल किताब के अनुसार मंगल अगर खाना संख्या पांच में है तो संतान मंगल के समान पराक्रमी और साहसी होगी (Mars in fifth house gives a child as brave as Mars) संतान के जन्म के साथ व्यक्ति का पराक्रम और प्रभाव बढ़ता है. शत्रु का भय इन्हें नहीं सताता है. इस खाने में मंगल अगर मंदा है तो व्यक्ति को अपनी चारपायी या पलंग के सभी पायों में तांबे की कील ठोकनी चाहिए. इस उपाय से संतान सम्बन्धी मंगल का दोष दूर होता है.

पांचवें घर में बुध (Mercury in fifth house)
बुध का पांचवें घर में होना इस बात का संकेत है कि संतान बुद्धिमान और गुणी होगी (Mercury in the fifth house of lal kitab kundali gives an intelligent child). संतान की शिक्षा अच्छी होगी. अगर व्यक्ति चांदी धारण करता है तो यह संतान के लिए लाभप्रद होता है. संतान के हित में पंचम भाव में बुध वाले व्यक्ति को अकारण विवादों में नहीं उलझना चाहिए अन्यथा संतान से मतभेद होता है.

पांचवें घर में गुरू (Jupiter in the fifth house)
पंचम भाव में गुरू शुभ होने से संतान के सम्बन्ध में शुभ परिणाम प्राप्त होता है. संतान के जन्म के पश्चात व्यक्ति का भाग्य बली होता है और दिनानुदिन कामयाबी मिलती (A person gains success after birth of child if Jupiter is in fifth house) है. संतान बुद्धिमान और नेक होती है. अगर गुरू मंदा हो तो संतान के विषय में शुभ फल प्राप्त नहीं होता है. मंदे गुरू वाले व्यक्ति को गुरू का उपाय करना चाहिए.

पांचवें घर में शुक्र (Venus is in fifth house of Lal kitab kundali)
पांचवें घर में शुक्र का प्रभाव शुभ होने से संतान के विषय में शुभ फल प्राप्त होता है. इनके घर संतान का जन्म होते ही धन का आगमन तेजी से होता है (Person gains money when a child is born and Venus is in the fifth house). व्यक्ति अगर सद्चरित्र होता है तो उसकी संतान पसिद्ध होती है. अगर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व और चरित्र का ध्यान नहीं रखता है तो संतान के जन्म के पश्चात कई प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना होता है. शुक्र अगर इस भाव में मंदा हो तो दूध से स्नान करना चाहिए।

पांचवें घर में शनि (Saturn in the fifth house)
शनि पांचवें घर में होने से संतान सुख प्राप्त होता है. शनि के प्रभाव से संतान जीवन में अपनी मेहनत और लगन से उन्नति करती है (Saturn in fifth house of lal kitab gives success with own efforts). इनकी संतान स्वयं काफी धन सम्पत्ति अर्जित करती है. अगर शनि इस खाने में मंदा होता है तो कन्या संतान की ओर से व्यक्ति को परेशानी होती है. इस भाव में शनि की शुभता के लिए व्यक्ति को मंदिर में बादाम चढ़ाने चाहिए और उसमें से 5-7 बादाम वापस घर में लाकर रखने चाहिए.

पांचवें घर में राहु (Rahu in the fifth house)
खाना नम्बर पांच में राहु होने से संतान सुख विलम्ब से प्राप्त होता है. अगर रहु शुभ स्थिति में हो तो पुत्र सुख की संभावना प्रबल रहती है. मंदा राहु पुत्र संतान को कष्ट देता है. लाल किताब के अनुसार मंदा राहु होने पर व्यक्ति को संतान के जन्म के समय उत्सव नहीं मनाना चाहिए. अगर संतान सुख में बाधा आ रही हो तो व्यक्ति को अपनी पत्नी से दुबारा शादी करनी चाहिए.

पांचवें घर में केतु (Ketu in the fifth house)
केतु भी राहु के समान अशुभ ग्रह है लेकिन पंचम भाव में इसकी उपस्थिति शुभ हो तो संतान के जन्म के साथ ही व्यक्ति को आकस्मिक लाभ मिलना शुरू हो जाता है. यदि केतु इस खाने में मंदा हो तो व्यक्ति को मसूर की दाल का दान करना चाहिए. इस उपाय से संतान के विषय में केतु का मंदा प्रभाव कम होता है.

राशि चक्र

 हम ऎसे कुछ तथ्यों की चर्चा इस लेख में करेंगे।
चन्द्रमा का चक्र: 
आप अपने जीवन की कोई भी घटना ले लीजिए। चाहे विवाह, चाहे नौकरी या आपकी कमाई का पहला दिन। उस दिन से ठीक सात साल में वह घटना किसी न किसी रूप मे पुन: प्रकट होगी। घटना का स्वरूप अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। मान लीजिए आपका विवाह अप्रैल 1985 में हुआ तो अप्रैल 1992, अप्रैल 1999, अप्रैल 2006में विवाह से संबंधित अच्छी या बुरी घटनाएं आएंगी। विवाह से तात्पर्य वैवाहिक जीवन से है। आपको देखने को मिलेगा कि अप्रैल के स्थान पर जनवरी, फरवरी भी हो सकता है या मई-जून भी हो सकता है इससे अधिक अंतर देखने को नहीं मिलता।
बृहस्पति का चक्र:
बृहस्पति हर 12 वर्ष के बाद राशि बदलते हैं और वह घटनाक्रम कम या ज्यादा होगा या थो़डे बहुत स्वरूप परिवर्तन के साथ पुन:-पुन: घटता है। मान लीजिए, आपकी नौकरी दिसम्बर 1992 में लगी। इसके ठीक 12 वर्ष बाद आप या तो नई नौकरी मिलेगी या इसी नौकरी मे पदोन्नति होगी या नौकरी जाने का खतरा हो सकता है। अगर मूल घटना शुभ है तो पुनरावृत्ति भी शुभ ही होगी। यदि मूल घटना अशुभ है तो पुनरावृत्ति भी अशुभ ही होगी। कभी-कभी यह क्रम बदल सकता है।
शनि का चक्र:
शनि 30 वर्ष में राशि चक्र की परिक्रमा पूरी करते हैं। जिस राशि में शनि जन्म के समय हों, उसी राशि में वह 27-30 वर्ष की अवधि में प्रवेश करेंगे। जब-जब शनि पुन: उस राशि पर आते हैं तब-तब आजीविका क्षेत्रों में ब़डे परिवर्तन आते हैं। नौकरी या व्यवसाय के बदलने की संभावना रहती है या आदमी नए उपक्रम करता है।
शनि बृहस्पति चक्र: 
जब-जब बृहस्पति जन्मकालीन शनि के ऊपर से भ्रमण करते हैं तो उस वर्ष आजीविका क्षेत्रों में परिवर्तन आते हैं। या तो व्यक्ति नौकरी बदलता है या व्यवसाय के विषयों में परिवर्तन आते हैं। जन्मकालीन बृहस्पति के ऊपर से जब-जब शनि भ्रमण करते हैं तब भी अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। प्रथम मामले में हर 12 वर्ष में घटनाओं की पुनरावृत्ति होगी तो दूसरे मामले मे 27-30 वर्ष में घटनाओं की पुनरावृत्ति होगी। इस क्रम में घटनाएं तीव्र हो सकती हैं या रूप बदल सकती हैं। घटनाओं की प्रकृति लगभग एक जैसी होगी।
राहु चक्र: 
राहु राशि चक्र में 18वर्ष में अपना एक भ्रमण पूरा करते हैं। वह उसी राशि पर 16से 18वर्ष के बीच मे आते हैं। जब-जब गोचर के राहु जन्मकालीन राहु पर भ्रमण करेंगे तो व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण घटनाएं आएंगी। ऎसा वर्ष आजीविका क्षेत्रों मे व्यापक परिवर्तन ला सकता है। 
शनि बृहस्पति - षष्ठिपूर्ति का नियम:
बृहस्पति व शनि जन्मकालीन राशियों मे जब दुबारा कभी एक साथ आएं जो कि आमतौर से 60 वर्ष में घटित होता है तो व्यक्ति के जीवन में उत्थान या पतन देखने को मिलता है। पुराने समय में षष्ठिपूर्ति का ब़डा सम्मान किया जाता था और व्यक्ति उत्थान की कामना करता था पर कभी-कभी इसका विपरीत भी देखा गया है। 

Sunday, October 20, 2013

GUIDELINES TO POLICE OFFICERS INVESTIGATING CASES UNDER SC/ST (POA) ACT, 1989 & PCR ACT, 1955

GUIDELINES TO POLICE OFFICERS INVESTIGATING CASES UNDER SC/ST (POA) ACT, 1989 & PCR ACT, 1955
Article 17 of the Constitution of India has abolished the practice of untouchability in all forms To give effect to this Article. Parliament enacted the Untouchability (Offences) Act, 1955 and later renamed it as The Protection of Civil Rights’ Act, 1955 and notified the Rules in 1977 to implement the Provisions of the Act Later, the Parliament passed the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 which enable the police authorities for taking specific measures to prevent the atrocities to carry out the provisions of this Act, the Government of India notified the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Rules in the year 1995. In view of the above, the Police Officers have been entrusted with the noble duty to implement all the provisions of the enactments and in right spirit. In this regard, certain measures which are needed to be taken by the Police Officers, who directly or indirectly deal with the incidents of atrocities or practice of untouchability in their respective jurisdiction are as under
1) To identify the atrocities prone areas / villages in order to enable themselves to take adequate preventing measures well in time.
2) They should visit the identified areas and review the Law and Order situation from time to time.
3) To cancel the Arms licenses of the persons who have misused a licensed firearms for committing atrocities or are likely to commit atrocities.
4) To organize Awareness Campaign in the identified areas to educate the SCs/STs about their rights and protections available to them under different enactments.
5) To deploy pickets in such identified areas, where there is an imminent danger of reprisal against SCs/ STs.
6) In extreme situations Arms licenses may be recommended to be issued to the SCs/ STs to enable them to protect their lives and properties.
7) Any complaint of atrocity on SCs/STs by forcing them to eat any inedible substance, causing insult or annoyance, parading them naked / with painted face, wrongful occupation / dispossession from their land, house etc.. forcing bonded labour, use of force in casting of vote, institution of false cases, intentional insult in public view, outraging modesty of SC/ST women, refusing access to a place of public resort, expelling SCs/STs from their houses / village etc. are covered under section 3 (1) of the SCs / STs (POA) Act Whereas, some of offences like fabricating false evidence, mischief by fire, attempt to cause disappearance of the evidence etc. for which the SC/ST person is likely to be convicted of an offence which is not capital but punishable with imprisonment of (07) years or upwards, would fall u/s 3(2) of the SCs/STs (POA) Act.
8) All the cases of atrocities on SCs/STs by non SCs and STs should be registered under the provisions of the SCs/STs (POA) Act, 1989 only, while the cases of enforcing any disability on account of preaching and practicing untouchability should be booked under the provisions of PCR Act. All the concerned officers should clearly understand the provisions of these two enactments and their applicability.
9) If any offence under sec. 3 of SCs/STs (POA) Act is committed by a public servant, he is liable to be prosecuted u/s 3(2) (VII).
10) On receipt of a representation / compliant pertaining to any offence under the provisions of thee SCs / STs (POA) Act either in writing or orally at the Police Station, the Officers -in-charge shall register a case, as provided under Rule 5(1) of the POA Rules of 1995 r/w 154 Cr.PC and if the Officer — in — charge of the Police Stations fails to do so, it amounts to “willful neglect of duty” which in itself is an offence u/s 4 of the said Act.
11) While registering FIR. it should be ensured that correct Sections and Sub Sections under the appropriate Act are applied Any attempt of burking or minimizing the gravity of the offence shall be treated as “Willful neglect of duty ”.
12) All the cases of bogus caste certificates should be booked u/s 420 IPC.
13) The lOs should refrain from becoming parties to the compromises / out of court settlements in cases of specific accusations as defined under the Acts.
14) All the Cases referred u/s 156 (3) Cr.PC. by the court should be promptly registered and the FIR copies should be sent to court and other concerned officers without any delay If there is any dereliction of duty on the part of the IO, he shall be liable for contempt of court and also for Departmental action
15) FIR copy in every case should be sent to the District Magistrate, to enable him to take decision regarding sanction of relief and rehabilitation measures and a copy of the FIR should also be given to the complainant.
16) FIR copy should also be sent to the CP/ SP promptly with a request to appoint the 10 at the earliest, to enable the 10 to commence investigation without any loss of time.
17) The Investigation Officer i.e.an ACP/ DSP has to be appointed by the C.P / SsP. to expeditiously investigate the case booked under (POA) Act. 1989 as envisaged under Rule 7(1) of SCs/STs (POA) Rules of 1995. Non-compliance of the above legal requirement would vitiate the entire investigation.
18) Rule 7(2) stipulates that the investigating officer so appointed under sub-rule (1) shall complete the investigation on top priority basis within thirty days.
19) In case the appointed IO is transferred out, any another Dy SP is to be appointed as IO and it has to be done by issuing a fresh Appointment Order by S P/C P. U/Rule 7(1) of SC/ST (POA) Rules, 1995.
20) On receipt of the appointment order from the SP/C.P the appointed IO should take up investigation from the stage of FIR. If the initial investigation has been done by an incompetent officer, it is an irregular investigation and mere verification of such investigation by the Dy SP is void and irregular under the Law.
21) In case, the incompetent officer has filed the charge sheet after his investigation, it is null and void and hence the specially appointed Dy.SP should seek permission of the court by filling petition u/s 173(8)Cr.PC and proceed with further investigation from the initial stage i.e from the FIR stage after obtaining the permission of the Court.
22) Since, the investigation in cases under POA Act need to be completed within 30 days, the IO must ensure that the witnesses to be examined u/s 164 Cr.PC are examined within the stipulated period. Tendency to get 164 Cr.Pc statement done after months together should be put to an end. as such practice is found to be against the interest of the victim / complainant.
23) The lOs should refrain from getting the statements of witnesses recorded u/s 164 Cr.PC if it is likely to weaken the case of prosecution. As per established Law. such statements only should be got recorded u/s 164 Cr PC which are likely to strengthen the case.
24) In cases of bogus caste certificates, the IO should also invariably investigate into the conduct and character of the certificate issuing / inquiring authorities for heir prosecution if so required and write to the concerned department for initiating
departmental action against the accused officers, while furnishing the relevant material required to be relied upon by the appropriate authority.
25) The IO after recording the statements of witnesses u/s 161 Cr.PC must hand over a copy of the same to the concerned witnesses under acknowledgement on the original copy as it would help in ensuring the truthfulness of the statements and the witness may refer to the same prior to his examination in the court. It would also stop the IOs from doing table investigation and that too at his convenient time.
26) The lOs should not hesitate to arrest the accused promptly when they are likely to tamper with the evidence by way of threatening or winning over the witness or terrorise the complainant or they are likely to abscond etc. It should also be ensured that the non-arrest of the accused does not result into commission of series of offences against the victims. Hence, the timely arrest goes a long way in preventing the offence and to enthuse confidence in the victims and the community.
27) On knowing that Anticipatory Bail petition has been filed in the Sessions Court or High Court by the accused, the ID should immediately meet the concerned APP/SpI PP/ PP and apprise him of the facts of the case, to enable him to oppose the bail However, if the court entertains such petition, the lO/SpI PP/PP/ APP should rely upon Section 18 of SCs/STs (POA) Act.
28) The Investigation Officer should examine the important and relevant witnesses only, as that would help him to unearth the truth and complete the investigation within a period of 30 days.
29) It is noticed that some of the accused are getting counter cases registered against the SC/ST complainants. In this regard, the lOs must ensure that the investigation in both the cases is completed within 30 days and that the false case is closed Undue delays in this regard are viewed with suspicion by the public and victim in particular.
30) Adequate care should be taken by the IO to complete the investigation within the stipulated period i.e. 30 days and submit the report, lest on this ground the entire investigation may be held as null and void by the court being violation of Rule 7(2) of SCs/STs(POA) Rules.
31) In the cases booked against public servants, the concerned lOs should obtain permission of the Govt, to prosecute the accused u/s 197 Cr.PC before laying the charge sheet.
32) It is a well-established principle that the evidence of the complainant alone shall be sufficient for laying the charge sheet in the Court if it is capable of inspiring the confidence of the court The tendency to close the cases as False/MF, on the basis of the evidence of unimportant witnesses while ignoring the evidence of the complainant needs to be put to an end.
33) The IO must furnish the required number of copies of the relevant material to the accused and promptly produce the accused in the court to get the charges framed early in the designated Sessions Court.
34) In these cases, the IO must make an attempt to gather evidence to the effect that the accused were aware of the victim’s caste at the time of committing the offence,
35) After completion of investigation, the IO should file the charge sheet in the concerned ACJM Court for committal sake and not at all in the Special Court.
36) The lOs should send Memo of Evidence incorporating List of Documents, List of Material Objects and also List of Witnesses along with Charge Sheet and obtain acknowledgement for the same.
37) The IO should enclose injury reports, FSL Report, Medical opinion etc. along with the Charge Sheet while filing in the Court.
38) Any attempt on the part of the accused to threaten the witnesses or to tamper with the evidence etc. the IO should bring it to the notice of the Court and seek denial or cancellation of the bail as the case may be.
39) The IO should proceed u/s 82 & 83 Cr.PC against the sureties, where the accused are absconding and NBWs issued against them.
40) The IO should take prompt and effective steps in consultation with the PP to get the stays vacated by approaching the Superior Courts.
41) The Investigating Officer should produce the witnesses before the APPs for refreshing their memory before they are produced before the court The witnesses or whose 164 statements are already recorded must be warned of action u/s 193 IPC if they turn hostile in the court.
42) It the witnesses in attendance in courts are to be sent back without examination by the Court on the request or due to absence of the accused, the Prosecuting
Officers should insist on the examination of such witnesses or insist on payment of cost to the witnesses by the accused, as provided u/ Rule 11 of SCs/STs (POA) Rules. 1995.
43) The SsP must ensure that the District Magistrate do prepare a panel of Senior Advocates for conducting cases in the Special Courts as Spl PP and send the same to the Government to notification in the official gazette. The District Magistrate may also be requested to review the performance of the Special PP at least twice in a year and in case he has not conducted the cases with due care and caution, his name may be sent for de-notification.
44) The Commissioner of Police / Superintendents of Police Unit Officers may also recommend to the District Magistrate, if so desired by the victims, to engage an eminent Senior Advocate for conducting the cases in Special Court.
45) Summons on the Police Officers to give their evidence should be served promptly and it should be ensured by the supervisory officers that they do attend the Court to give their evidence.
46) Police should assist the Courts in bringing forward the witnesses / accused promptly to ensure smooth and expeditious trial of the case.
47) The dilatory tactics adopted by the accused should be effectively and honestly countered by way of formally opposing the applications for adjournments u/s 309 Cr.PC and also request the Court to go ahead with the trial as provided u/s 317 (1) Cr.PC.
48) The Commissioners of Police / Superintendents of Police should ensure that Special PPs are appointed in every Special Court meant for handling such cases.
49) The cases are getting abnormally delayed mainly due to non-attendance by the accused, non-attendance by the witnesses, lack of commitment on the part of the lOs / APP/Spl.PP/PP etc. It can be countered by formally opposing the exemption from attendance petitions and obtaining NBWs against such accused The lOs should also sincerely execute the NBWs / BWs against the accused and witnesses to ensure speedy trial and also to proceed u/s 82 and 83 Cr.PC against them if situation so warrants.
50) In cases where some of the accused are not attending the court for a long time, the IO/APP/Spl.PP/PP should get the case split up against the absconding accused, who are not likely to be arrested in near future. a$ provided u/s 317 (2) Cr PC.
51) Where there is no likelihood to secure the presence of the accused in near future after framing of the charges, the IO/APP/Spl.PP/PP should request the court to examine the witnesses u/s 299 Cr.PC.
52) The Commissioners of Police / Superintendents of Police must initiate appropriate disciplinary action against the lOs for the lapses pointed out in the Judgment and in cases of lapses on the part of Special PPs the same may be addressed to the District Magistrate / Director of Prosecutions / Ld Legal Remembrancer, Government of West Bengal.
53) The Commissioners of Police / Superintendents of Police West Bengal must actively liaise with the District Magistrate for effective functioning of District Vigilance & Monitoring Committee by way of causing critical review of cases for their expeditious disposal, organizing Awareness Campaigns, seeking involvement of NGOs review of relief and rehabilitation measures, formulation of Model Contingency Plans for preventing disputes and caste related social disturbances, etc.
54) The stringent provisions of the Act including neglect of duty by public servant, forfeiture of property, internment of persons from Scheduled and Tribal areas, imposition of collective fines, if judiciously implemented would create deterrent climate.
55) In all the acquittal cases, the judgment copies should be obtained from the court at the earliest to send the same to the concerned SP or Inspector General of Police-1, CID, West Bengal along with the opinion of APP/ Spl.PP/PP within (20) days for scrutiny and to enable them to take decision regarding filing an appeal or otherwise.
56) The Commissioners of Police / Superintendents of Police should personally review the Final Reports and take appropriate decision at their level keeping the following points in view among other things.
a) Whether the IO has explained the delay in lodging the complaint, if any
b) Whether the IO has examined all the eye witnesses specially those who have been cited in the complaint.
c) Whether the IO has collected the Caste Certificate of the complainant and accused
d) Whether valid appointment orders are placed in the CD file.
e) Whether opinion of the concerned A.P.P /Spl. PP/ PP has been obtained
f) Whether the Investigation Officer so appointed under Rule 7 (1) of SC/ST (POA) Rules, 1995 had completed the investigation on top priority within 30 days as required under Rule 7(2) of SC/ST (POA) Rules, 1995.
57) The District Superintendents of Police/ Commissioners of Police are requested to take action against any Police Officer u/s 4 of SCs/STs (POA) Act, 1989 who willfully neglects his duties required to be performed by him under this Act.
58) The copies of Judgments in all acquitted / convicted cases also should be sent to Inspector General of Police – I, CID, West Bengal.
The above instructions should be communicated to all the Officers — in — charge of Police Stations (including I/C’s) and Investigating Officers.
This issues with the approval of DGP, CID, West Bengal.
Addl. Director General of Police – ll,
CID, Bhawni Bhaban, Alipore
Kolkata- 700 027

Wednesday, October 16, 2013

REGAR SAMAJ

1. स्वामी ज्ञानस्वरूपजी महाराज 
(अ). रैगर समाज के पहले महात्मा थे जिनको सन् 1986 में भारत के तात्कालिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह द्वारा ‘रैगर रत्न’ तथा सन् 1988 में सनातन धर्म प्रतिनिधि सम्मेलन दिल्ली में तात्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने ‘धर्मगुरू’ की उपाधि से विभूषित किया ।
(ब). स्वामी ज्ञानस्वरूपजी महाराज की अध्यक्षता में गठित ‘जागृत पत्र प्रकाशन समिति- 'दिल्ली’ के तत्वाधान में रैगर समाज का पहला मासिक समाचार पत्र ‘जागृति’ 2 अक्टूबर 1948 को दिल्ली से प्रकाशित हुआ था ।
2. श्री नवल प्रभाकर : दिल्ली
रैगर समाज के पहले सांसद, जिन्होंने 1952 में करोल बाग, दिल्ली से लोकसभा का चुनाव जीता ।
3. श्रीमती सुन्दरवती नवल प्रभाकर : दिल्ली
रैगर समाज की पहली महिला सांसद, जिन्होंने 1972 में करोल बाग, दिल्ली से लोकसभा का चुनाव जीती ।
4. श्री धर्मदास शास्त्री : दिल्ली
रैगर समाज के पहले सांसद जिन्होंने भारत की तात्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गॉंधी को सन् 1948 में तथा तात्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह को सन् 1986 में रैगर समाज के बीच में लाकर समाज से अवगत कराया और विश्व स्तर पर रैगर समाज को पहचान दिलाई ।
5. श्री भंवरलाल नवल : छोटी खाटू (नागौर) राजस्थान, हाल प्रवासी अमेरिका
(अ). रैगर समाज के पहले दानवीर सेठ जिन्होंने लगभग 1400 जोड़ों के समाज एवं अन्य समाजों के सामूहिक विवाह अपने समस्त खर्चे से सम्पन्न करवाए । एक ही व्यक्ति द्वारा इतने सामूहिक विवाह सम्पन्न करवाने का सम्भवत: यह पहला विश्व रिकार्ड है, जो भारत एवं रैगर समाज के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखने योग्य है । 
(ब). रैगर समाज के पहले दानदाता तथा समाजसेवी है जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और अकाल राहत, गरीबों की सहायता पर करोडों रूपये खर्च किए है ।
6. श्री छोगालाल कंवरिया : राजस्थान
रैगर समाज के पहले व्यक्ति जो प्रदेश मंत्रीमण्डल में केबीनेट मंत्री बने । दिनांक 19.01.1981 से 16.10.1982 तक आप राजस्थान सरकार में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री रहे ।
7. श्रीमती मीरां कंवरिया : दिल्ली
पहली रैगर महिला जो दिल्ली नगर निगम की (1997-2000) महापौर रही ।
8. श्रीमती आनन्दीदेवी जेलिया : कोटा (राज. )
पहली रैगर महिला विधायक जो द्विवीय राजस्थान विधान सभा (1957-1962) में बारां (सु. ) से राजस्थान विधान सभा की सदस्य चुनी गई ।
9. श्री विनोद जाजोरिया : दिल्ली
रैगर समाज का पहले IAS (1967)
10. श्री यादराम धूडि़या : दिल्ली
रैगर समाज का पहले IPS (1965)
11. श्री श्रवण कुमार दास : राजस्थान
पहले रैगर IPS जो किसी प्रदेश का महानिदेशक पुलिस (डी.जी.पी. ) बना । दिसम्बर, 2003 से 31 मार्च, 2005 तक श्री दास मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे ।
12. श्री चिरंजीलाल बाकोलिया : दिल्ली 
भारतीय राजस्व सेवा (1967) के श्री चिरंजीलाल बाकोलिया को रैगर समाज का पहले आयकर आयुक्त होने का सौभाग्य मिला ।
13. श्री आर.पी. नीडर : दिवराला (राजस्थान) 
रैगर समाज का पहले RAS (1973)
14. श्री चन्दनमल नवल : जोधपुर (राज. )
(अ). रैगर समाज का पहले RPS (1977) उप अधीक्षक पुलिस, 1977 तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक 1984
(ब). रैगर समाज का पहले पुलिस अधिकारी जिसे वर्ष 1992-93 में पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरों, गृहमंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘पं. गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार’ (प्रशस्ति पत्र के साथ रू.7000/- नकद) प्रदान किया गया । यह पुलिस से सम्बंधित विषयों पर हिन्दी में लेखन पर दिया जाने वाला सर्वोच्य राष्ट्रीय पुरस्कार है ।
भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 1994 में ‘डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया ।
15. श्री रूद्रदेव शक्करवाल : दिल्ली
रैगर समाज का पहले इंजीनियर स्नातक जिसने सन् 1959 में दिल्ली विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की ।
16. श्री सुगनचन्द सिंगाडि़या : जैतारण (राज. )
पहले रैगर जो प्रदेश लोक सेवा आयोग का सदस्य रहा । श्री सिंगाडि़या सन् 1986 में छ: वर्ष के लिए राजस्थान लोक सेवा अयोग का सदस्य नियुक्त किया गया था ।
17. श्री नवल किशोर निडर : जयपुर (राज. )
पहले रैगर जो वकील बने ।
18. श्री भोलाराम तोंणगरिया : हैदराबाद सिंध
(अ). पहले रैगर जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व सिंध हैदराबाद (पाकिस्तान) में म्युनिसिपल कमीशनर रहे ।
(ब). अखिल भारतीय रैगर महासभा के पहले प्रधान (1944) बने ।
19. श्री जसपतराय गिरधर : दिल्ली
रैगर समाज में सबसे पहले मैट्रिक पास श्री जसपतराय गिरधर ने की थी ।
20. अनिता बाकोलिया : देवदर (सिरोही)
पहली रैगर महिला जो जिला प्रमुख बनी । वर्ष 2000-05 में सिरोही की जिला प्रमुख रही है । अनिता बाकोलिया स्व. छोगाराम बाकोलिया पूर्व मंत्री की सुपुत्री है ।
21. श्री कज्जूलाल जाजोरिया : जोबनेर (जयपुर)
रैगर समाज के पहले व्यक्ति जो नगरपालिका का चेयरमेन बने । श्री कज्जूलाल जाजोरिया वर्ष 1964 में जोबनेर नगरपालिका के चैयरमेन चुने गये थे । (सरदार शहर नगरपालिका अध्यक्ष का कार्यभार सन् 1958 में महेशभाई बंशीवाल के पास रहा मगर वे चुने हुए अध्यक्ष नहीं थे ।)
22. श्रीमती दमयंति बाकोलिया : जयपुर
पहली रैगर महिला जो राज्य महिला आयोग की सदस्य रही । वर्ष 2003-06 में श्रीमती दयमंति बाकोलिया को राजस्थान महिला आयोग की सदस्य नियुक्त की गई थी ।
23. श्रीमती कांतादेवी वर्मा : इन्दौर (मध्य प्रदेश)
पहली रैगर महिला सम्पादक जिसने 1993 में ‘’रैगर उत्थान’’ समाचार पत्र का प्रकाशन इन्दौर से शुरू किया था ।
24. श्रीमती सीता कांसोटिया : कुचामन शहर (नागौर)
रैगर समाज की पहली महिला RPS (उप अधीक्षक, पुलिस) 1999
25. श्री नन्द किशोर चौहान : परबतसर (नागौर)
रैगर समाज का पहले व्यक्ति जो पंचायत समिति के प्रधान बने । श्रीनन्द किशोर चौहान वर्ष 2004 से 2007 तक पंचायत समिति परबतसर के प्रधान निर्विरोध चुने गये थे । श्री नन्दकिशोर पूर्व विधायक श्री मोहनलाल चौहान का सुपुत्र है ।
26. श्रीमती अनिता देवी (अनिता वर्मा) : चाकसू (जयपुर)
पहली रैगर महिला जो पंचायत समिति की प्रधान रही । श्रीमती अनिता देवी वर्ष 1995 से 2000 तक पंचायत समिति चाकसू की प्रधान निर्विरोध चुनी गई थी ।

27. श्रीमती अन्नीदेवी उदय : पुष्कर (राज. )
रैगर समाज की पहली महिला जो नगरपालिका की अध्यक्ष चुनी गई । श्रीमती अन्नीदेवी उदय वर्ष 1999 से 2003 तक पुष्कर नगरपालिका की अध्यक्ष रही है ।
28. श्री दयाराम जलुथरिया : दिल्ली
पहले रैगर जो दिल्ली महानगर परिष्द का सन् 1952 में सदस्य चुने गये ।
29. श्रीमती पार्वती आर्य (बालोटिया) : मन्दसौर (म.प्र. )
रैगर समाज की ही नहीं एशिया की प्रथम महिला ट्रक चालक का खिताब सन् 1986 में भारत के तत्कालिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह द्वारा उन्हें यह खिताब प्रदान किया गया । साथ ही साथ मध्य प्रदेश में पहली महिला जिला पंचायत उपाध्यक्ष वर्ष 2005 में बनी ।
30. श्री योगेन्द्र चान्दोलिया : दिल्ली (करोल बाग)
रैगर समाज की ही नहीं दलित समाज के प्रथम दिल्ली नगर निगम स्थायी समिति के अध्यक्ष पद के लिए 2009 चुने गये । और लगातार तीसरी बार अध्यक्ष चुने गये है । रैगर समाज में hat-trick जमाने वाले पहले व्यक्ति है । 
31. श्री ले. कर्नल जे.एल. कानवा (कनवाड़िया) : जोधपुर
पहले रैगर जिन्हे भारतीय सेना में कर्नल होने का गौरव मिला । आपने 21 दिसम्बर 1968 को अपनी ट्रेनिग पूरी करके द्वितीय लेफ्टीनेन्ट के पर आपका चयन हुआ । रैगर समाज में अभी तक बिरले ही हुए है जिनको अपने जीवन काल में तीन-तीन युद्धों में भाग लेने का गौरव प्राप्त हुआ हो । 

(साभार- चन्दनमल नवल कृत 'रैगर जाति : इतिहास एवं संस्कृति')

Tuesday, October 15, 2013

Senior citizens not conditioned enough to seek legal aid: Survey

Senior citizens not conditioned enough to seek legal aid: Survey
Nivedita Khandekar, Hindustan Times  New Delhi, August 19, 2012
West Delhi resident Rama Devi's son left home after differences with wife Radhika. When Rama, 65, filed a complaint of harassment, Radhika also filed a complaint of domestic violence and demanded exclusive right to property.
The court concluded that Radhika couldn't lay claim as Rama owned the property and hence cannot be treated as a joint family property.
Rama was lucky to get timely legal help. But many other senior citizens are not. The problem also lies with their conditioning. Many do not think of the option of taking legal recourse and if they want to, they do not have the wherewithal.
These findings were established in a survey of senior citizens: 'Legal Provisions and Practices in context of Protection of Human Right of Older Persons' carried out by NGO Agewell Foundation. About 7,500 of the 50,000 respondents were from Delhi-NCR. (see box)
Said Agewell's Himanshu Rath, "Legal provisions and practices help in providing a socially harmonious environment to the elderly. There is an urgent need to relook at the existing legal provisions to come up with more equitable and stronger legal provisions to encourage older person-friendly legal practices."   

SBK Singh, joint commissioner of police (crime), too, had earlier spoken about legal provisions for the seniors. "At a meeting with senior citizens last week, he had emphasised upon the need of preparing a will in their lifetime," said JR Gupta of Confederation of Senior Citizens Associations of Delhi.

Friday, October 11, 2013

LETTER-II

To,
Sh. Dharamender Singh,
New Delhi.
Dear Singh:
On behalf of GYAN LAKSHAY (NGO), I would like to thank you for your informative presentation on Meeting at the BLOOD DONATION Program on 20-05-2013.
We are fortunate to have had someone of your professional expertise and credentials volunteer time from your busy schedule to address the participants and serve as a resource person. We have got a very good response from Rajasthan Regar Samaj. Overall, the programmed was successful.
It has been a pleasure working with you, and I look forward to working with you in future social welfare & educational endeavors.
Sincerely,

GYAN LAKSHAY (NGO)

Thanks Letter to Chief Guest

To,
Sh. Dharamender Singh,
New Delhi.
Dear Singh:
On behalf of the GYAN LAKSHAY (NGO), we wish to thank you for the invaluable contribution you made at the BLOOD DONATION CAMP on 20-05-2013. From the feedback we’ve received, the program was a great success.
We appreciate the time you took out of your busy schedule to join us and thank you for sharing your insights and expertise with our attendees. Your willingness to volunteer your time, energy and support on behalf of GYAN LAKSHAY (NGO)’s Blood Donation Program is greatly appreciated.
Again, many thanks for your time and effort.
Sincerely,


GYAN LAKSHAY (NGO)

Letter of Appreciation

 Dear participants of 2013 BLOOD DONATION PROGRAME,

On behalf of the GYAN LAKSHAY (NGO) of our Second Blood Donation Programme on Health Promotion and Education we are pleased to say thank you to each of you who have attended this programme and thanks to our participants, special guests and guest speakers. We appreciate you for taking the time and effort to be here. We also thank you for your participation and the sharing your ideas and expertise. We certainly hope that the programme has been all that you expected it to be and that you have taken the opportunity to make new friends and renew old acquaintances and to have discussion and exchange of many experiences, suggestions and opinions with decisions makers, practitioners and researchers from all over the India.

Our objective for this programme was to build on the achievements of the 1st Blood Donation Programme held last year in Delhi with this year’s ultimate goal being to learn what we can do to achieve a healthier India. To accomplish this, we established this year’s programme agenda to enable us to discuss the many existing health problems and issues facing us today and then to determine the necessary solutions, actions, policies and programs to overcome these problems and issues. If we have been successful, we will take all the things we have learned back home with us and the results will be a healthier India by improving the health of our cities and communities, schools and universities, hospitals and workplaces.

We have been very fortunate to have a large group of well known experts in their respective fields participate in our programme. This group includes Professors, Educators, Doctors, Nurses, Social workers, Directors, Researchers, Consultants, Members of Boards and other authorities. Their involvement resulted in our very successful forums, workshops, symposiums, oral sessions and poster sessions. We want to thank each of them and also all the moderators who skillfully guided each of the group meetings. The direction of the conference was established early by our first Special address speaker, William Michael Sparks, giving The IGLNGO Strategic Plan and followed with very interesting topics by our other Special speakers. Extremely important speeches were given by our Keynote speakers on May 5 and May 6. We want to thank each for their participation and also the moderators in charge of those sessions. We believe all here will agree that we have achieved many results and can all agree that this year’s programe has been a great success.

 After closing our conference, we would like to say again, on the behalf of the GLNGO, how much we appreciate all of the co-organizers, supporting agencies, sponsors and conference staffs who contributed the grants and their efforts to us during the one-year conference preparation. We thank you. This programe would not have been a success without you. As we conclude the programe, we hope each of us will work together for health promotion. Welcome to Rajasthan again! See you in 2013 IGLNGO in Rajasthan and the 3rd programe!


Yours sincerely

Thanks Letter to Chief Guest and Guest of Honor for Attending Programme.



To,
Mr. RAGHUBIR SINGH GADEGAWNLIA,
Chief Director, Gyan Lakshay (NGO)
NEW DELHI-110087.
Subject: Thanks Letter to Chief Guest and Guest of Honor for Attending Programme.
Dear Sir/Madam,
This is to thank you for sparing time for the Guest of our Blood Donation program at Bhilwara. Your kind presence in the program encouraged us a lot and made us more confident in our struggle. It was a great pleasure to host you at our organization as the Chief Guest/Guest of Honour.
I appreciate your interest in the well-being of the Youth. Your suggestions have provided us a guideline to proceed more precisely for the betterment of this noble cause. We hope that this kindness and cooperation will remain continue in the future.
With warm regards,


(All Rajasthan Regar Yuva Mahasabha)

Thursday, October 10, 2013

EWS admission in pvt schools: 3-year residency criteria for migrants quashed

Coming down heavily on the government for "sub-classifying children belonging to weaker sections" on basis of residency, the Delhi High Court has quashed an order that requires migrant parents to stay in the city for three years continuously before their children can be admitted in a private school under the EWS category.
The court noted that the government "cannot issue such instructions, in exercise of the powers conferred upon it" because it went against provisions of the RTE Act.
"The respondent lacks competence to restrict admission in the category of children belonging to weaker sections only to those who have been staying in Delhi for a particular period. As a result of the restrictive definition of... children belonging to weaker sections..., a whole category of children belonging to weaker sections have been excluded from the benefit which the Statute accorded to them, merely because they have not been staying in Delhi for the past three years or more," the order states.
In an affidavit filed before the High Court, the Directorate of Education had said to study in a private unaided school under the EWS category, a migrant child must have stayed in the capital for three years so that his "education or seat does not go to waste".
The affidavit added that children who did not fit the bill were free to go to government schools, which have no such criteria.
The court also rejected the government's claim that it was only trying to "regulate admission in the 25 per cent quota so as to have optimal utilisation of such seats".
"I find no merit in the contention... by requiring residence in Delhi for at least three years, the respondents are certainly... creating two sub-classes of such children, one belonging to those who have been staying in Delhi for more than three years and one for those who have been staying in Delhi for less than three years," the order passed by Justice V K Singh said.
"A child whose parents have a total income of Rs 1,00,000 from all sources, irrespective of the period of his stay in Delhi, shall be deemed to be a child belonging to the weaker section and shall be entitled to be considered for admission in the category of "children belonging to weaker sections," the order said.

http://www.indianexpress.com/news/ews-admission-in-pvt-schools-3year-residency-criteria-for-migrants-quashed/1180595/0

Thursday, October 3, 2013

आवश्यकता है रक्तदान क्रांति की

दुनिया भर के चिकित्सा विज्ञानियों के मुताबिक आती सर्दियों में स्वाइन फ्लू वायरस का पलटवार और जोरदार ढंग से होगा। देश में इस समय डेंगू का प्रकोप जोरों पर है जिसे स्वाइन फ्लू के 'प्रचार' ने पीछे ढकेल रखा है। इन दोनों बीमारियों में मरीज के रक्त में 'प्लेटलेट' का स्तर खतरनाक ढंग से नीचे गिर जाता है।

हर साल देश की कुल 2433 ब्लड बैंकों में 70 लाख यूनिट रक्त इकट्ठा होता है। जबकि जरूरत है 90 लाख यूनिट की। इसका भी केवल 20 प्रतिशत ही रक्त बफर स्टॉक में रखा जाता है। शेष का इस्तेमाल कर लिया जाता है। नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (नाको) की गाइडलाइंस के मुताबिक दान में मिले हुए रक्त का 25 प्रतिशत बफर स्टॉक में जमा किया जाना चाहिए, जिसे सिर्फ आपातस्थिति में ही इस्तेमाल किया जा सके। एक यूनिट रक्त 450 मिलीलीटर होता है। आसन्न संकट के मद्देनजर देश को एक रक्तदान क्रांति की सख्त जरूरत है। 

मरीज की जान बचाने के लिए रक्त चढ़ाना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। शरीर के बाहर रक्त किसी भी परिस्थिति में 'पैदा' नहीं किया जा सकता। जाहिर है, इसे केवल रक्तदान से हासिल किया जा सकता है। रक्तदान दो तरह का होता हैः एक, जिसमें मरीज को चढ़ाए गए रक्त की भरपाई उसके स्वस्थ परिजन से लेकर की जाती है तथा दूसरे, 'स्वैच्छिक' रक्तदान से। 

फिलहाल माँग का केवल 53 प्रतिशत रक्त ही स्वैच्छिक रक्तदान से हासिल होता है। शेष की पूर्ति 'रिप्लेसमेंट' से होती है। 1998 में सर्वोच्च न्यायायल के निर्देश पर देश में पेशेवर रक्तदान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। न्यायालय की मंशा यह थी कि मरीज के परिजनों से लिए गए रक्त की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकेगी लेकिन इससे बचने के भी रास्ते निकल आए हैं। 

जिन मरीजों के परिजन रक्तदान करने की स्थिति में नहीं होते वे ऐसे पेशेवरों का सहारा लेते हैं जो रिश्तेदार तो नहीं हैं लेकिन ब्लडबैंक में 'रिश्तेदार' बनकर ही पहुँचते हैं। यही वजह है कि अब पेशेवर रक्तदाताओं का एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया जो पैसा लेकर ब्लड बैंक पहुँचने लगा है। बावजूद इसके रक्त की कमी हमेशा बनी रहती है।

इंडियन सोसायटी ऑफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन एंड इम्यूनो-हिमेटोलॉजी (आईएसबीटीआई) के मुताबिक स्थिति इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि हमारे देश में अब भी पूर्ण रक्त चढ़ाने का चलन है। विशेषज्ञों का मानना है कि रक्त को एक जीवनरक्षक औषधि के तौर पर देखा जाना चाहिए। 

अधिकांश मामलों में पूर्ण रक्त चढ़ाने की जरूरत नहीं होती बल्कि रक्त के अवयव (प्लेटलेट, आरबीसी, डब्ल्यूबीसी) चढ़ाने से ही मरीज ठीक हो जाता है। दुनिया भर में 90 प्रतिशत मामलों में रक्त के अवयवों का प्रयोग होता है जबकि हमारे देश में केवल 15 प्रतिशत मामलों में ही इनका प्रयोग होता है। 85 प्रतिशत मरीजों को पूर्ण रक्त चढ़ा दिया जाता है। 

इस विसंगति की दूसरी वजह यह भी है कि हमारे देश में ब्लड कंपोनेन्ट सेपरेटर मशीनें बहुत ही कम ब्लड बैंकों में लगी हैं। इसके अलावा कंपोनेन्ट्स को अलग करने में लागत बढ़ जाती है। रक्त की कमी के कारण देश में हर साल 15 लाख मरीज जान से हाथ धो बैठते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या उन बच्चों की है जिन्हें थेलेसीमिया के कारण जल्दी-जल्दी रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। हादसों के शिकार घायलों, मलेरिया के मरीजों, कुपोषणग्रस्त बच्चों के अतिरिक्त गर्भवती महिलाओं को कई कारणों से रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। 

संक्रमित रक्त का जोखिम 
दरअसल हमारे देश में स्वैच्छिक रक्तदान अब भी जीवनशैली का हिस्सा नहीं हो सका है। आज भी ऐसे नवधनाढ्यों की कमी नहीं है जो अस्पतालों के इमरजेंसी रूम्स या ऑपरेशन थिएटरों में पड़े अपने रिश्तेदारों को रक्तदान करने के बजाए मुँहमाँगी कीमत पर खून खरीद लेने की पेशकश करते हैं। ऐसे में पेशेवर रक्तदाता 'रिश्तेदार' बनकर सामने आते हैं। 

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प्रतिशत रक्त की जरूरत इन्हीं लोगों से पूरी होती है। ऐसे 'स्वैच्छिक' रक्तदाता के खून की गुणवत्ता तो निश्चित ही गिरी हुई होती है, साथ ही संक्रमित है या नहीं इसकी भी जाँच नहीं हो पाती। आज देश में हजार में से तीन लोगों को दूषित रक्त चढ़ाने के कारण एचआईवी का संक्रमण होता है। 

हर रक्तदाता को नियमानुसार पहले तीन महीनों के लिए निगरानी (विंडो पीरियड) में रखा जाना चाहिए। रक्तदाता के खून में एचआईवी का संक्रमण है या नहीं, यह जाँचने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। आज जिसने रक्तदान किया हो और परीक्षण में एचआईवी वायरस की रिपोर्ट नेगेटिव आई हो, उसका तीन महीने बाद पुनः परीक्षण होना चाहिए। इसमें संक्रमण नहीं आने पर ही रक्त किसी मरीज को चढ़ाने के योग्य समझा जाता है। हमारे यहाँ ऐसा नहीं हो पाता। यही वजह है कि पूर्ण रूप से स्वस्थ स्वयंसेवकों को रक्तदान के लिए आगे आना चाहिए। 

क्या है स्थिति रक्तदान की 
देश में फिलहाल केवल 500 ब्लड बैंक ही ऐसी हैं जिन्हें बड़ी ब्लड बैंक कहा जा सकता है। यहाँ हर साल 10 हजार यूनिट्स से अधिक रक्त जमा होता है। करीब 600 ऐसी ब्लड बैंकें हैं जो हर साल 600 यूनिट्स ही इकट्ठा कर पाती हैं। शेष 2433 ब्लड बैंक्स ऐसी हैं जो 3 से 5 हजार यूनिट्स हर साल इकट्ठा कर लेती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक देश में एबी प्लस प्लाज्मा, ओ-पॉजिटिव, ओ-नेगेटिव का स्टॉक रहना बहुत जरूरी है। किसी भी आपातस्थिति में (जैसेमुंबई पर आतंकवादी हमला) जब घायलों को रक्त चढ़ाने के लिए परिजनों की राह नहीं देखी जा सकती हो, उन परिस्थितियों में उपरोक्त रक्त समूह का प्रयोग किया जाता है।

देश में लगभग 25 लाख लोग स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं। सबसे अधिक ब्लड बैंक महाराष्ट्र (270) में हैं। इसके बाद तमिलनाडु (240) और आंध्रप्रदेश (222) का स्थान आता है। दान में मिला हुआ आधा लीटर रक्त तीन मरीजों की जान बचा सकता है। सबसे दुखद स्थिति उत्तर पूर्व के सात राज्यों की है। सातों राज्यों में कुल मिलाकर 29 अधिकृत ब्लड बैंक्स हैं। 

ND

कैसा होना चाहिए रक्त 
इंडियन फार्माकोपिया के मुताबिक मानव रक्त एक औषधि है। इसके लिए कुछ शर्तें और नियम लागू किए गए हैं। मरीज को चढ़ाने के लिए प्राप्त रक्त को एचआईवी एंटीबॉडीज संक्रमण से मुक्त होना चाहिए। इसे हिपेटाईटिस बी और सी नामक वायरसों के अलावा सिफलिस, मलेरिया आदि से भी मुक्त होना चाहिए। 

कौन कर सकता रक्तदान 
कोई भी ऐसा व्यक्ति रक्तदान कर सकता है, जो

1. 18-60 
वर्ष की उम्र का हो,

2. 
तीन साल से जिसे मलेरिया का संक्रमण न हुआ हो,

3. 
एक साल से पीलिया न हुआ हो,

4. 
उच्च रक्तचाप और डायबिटीज का रोगी न हो। 

स्वैच्छिक रक्तदान को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ करें नया 
देश में स्वैच्छिक रक्तदान को प्रोत्साहित करने के लिए अब तक जो कुछ भी किया गया है वह अपर्याप्त साबित हुआ है। दरअसल जितनी बड़ी मात्रा में हमें शुद्ध रक्त चाहिए उसके लिए एक महा-आंदोलन की जरूरत है।